हर हाल में हमें एक नायक चाहिए
इस देश को जीने के लिए एक नायक चाहिए। नायक जो उसके दुख सहन करे। जनता के दुख दूर करे। इस नायक की कमी आते ही लोग अनाथ महसूस करने लगते हैं। अराजक स्थितियों की आशंकाएं व्यक्त की जाने लगती है। इस नायक के नाम पर रावण की बलि भी मंजूर है। महाभारत पर भी आपत्ति नहीं है लेकिन चाहिए एक नायक।
यह राम के वेश में हो सकता है। कृष्ण का नाम प्राप्त कर सकता है। इनकी मौत खबर नहीं बनती लेकिन जीवन चरित्र बन जाता है। यह समाज का स्वार्थ है कि इनका दीप-विसर्जन होने से पहले नए दीप जला लिए जाते हैं। यह जरूरत भी है। परंपरा भी यही है कि राजसिंहासन खाली नहीं रहता। राजा के अंतिम संस्कार से पहले राज्याभिषेक जरूरी है। इसी तरह नायक के नहीं रहने की आशंका से पहले दूसरा नायक जरूरी है। इससे किसी को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए। इससे किसी को नाक-भौं भी नहीं सिकोड़नी चाहिए।
लिहाजा, इस देश में नायक बूढ़ा भी नहीं होता। होता है तो खबर बनती है। तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के राजीव गांधी की समाधि के पास लड़खड़ाने की खबर के बराबर अमिताभ बच्चन का सफेद दाढ़ी में प्रकटना भी उस दिन की एक बड़ी खबर थी। सो, नायक कभी बूढ़े नहीं होते।
आप कहीं भूलते तो नहीं जा रहे हमारे राष्ट्रपति रहे एपीजे अब्दुल कलाम को, हमारे मिसाइल मैन! जिन्होंने बुध्द के चेहरे पर मुस्कुराहट दी और देश को विजन दिया और रातों रात सपने जगा गए। नहीं चाहता उन्हें भूला जाए लेकिन जिस देश को गांधी भुलाने की आदत हो, उनसे यह अपेक्षा तो बेमानी ही है लेकिन जब यह तय हो जाए तो इसे नैतिकता से जोड़ना ही नहीं चाहिए। यह जरूरत है हमारी। हमें जीने के लिए नायक चाहिए। नायक-जो हमारे लिए लड़ने का माद्दा रखता हो। नायक-जिसे अपने घर की चिंता नहीं हो किसी के कहने पर सीता को घर से निकालने का हौसला रखता हो। नायक-जो मथुरा, गोकुल, वृंदावन, हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र में घूमता रहे और अंतत: बहेलिये का शिकार हो जाए।
ऐसे नाम हजार मिल जाएंगे। गौतम बुध्द, महावीर, सम्राट अशोक, विवेकानंद, भगतसिंह, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी जैसे नाम जिन्हें आज भी हम दिवस-वार, जयंती-पुण्यतिथि पर याद करते हैं। कोई माने या न माने, हम हर बार यही कहते हैं कि आप जैसा कोई और नहीं। इंसानों में तो हो ही नहीं सकता। इस तरह हम इन्हें देवतुल्य भी बना देते हैं। फिर इसमें भी किसे इंकार है कि जिन्हें हम देवता या भगवान कहकर अपनी आस्था के दीप जलाते हैं, वे भी तो कभी नायक ही रहे। इस तरह हम अपने लिए जाने क्या-क्या पैहरन पहना देते हैं। कहते हैं आदर्श, पैगंबर। प्रतिष्ठा देते हैं जैसे हो अनन्य। साबित कर देते हैं – दूसरा न कोई। कहते हैं पीढ़ियां चलेंगी आपके दिखाए मार्ग पर। इसीलिए शहर-दर-शहर उनके नाम पर रास्ते निकालते हैं।
एक दिन जब भंग होता दिखता है नायक का धनुष। हम नया नायक जुटा लेते हैं। फिर उसे देते हैं धनुष। चढ़ाने को विवश करते हैं प्रत्यंचा। मिलती है सीता। सीता-चुनौतियों सी। रावण-बाधाओं सा। नायक लड़ता रहता है। उसके लड़ने से हमें ऊर्जा मिलती है। हमारा विश्वास बना रहता है। हमें मिलता है जीने का आधार। प्रेरणाएं। बस, एक नायक इससे ज्यादा क्या दे सकता है। बदले में हम देने का वादा करते हैं-जयकारे।
ऐसा हम सदियों से करते आए हैं। अभी भी कर रहे हैं। इन दिनों भी मेरा देश ऐसे ही कुछ लोगों को मैदान में उतारे हुए हैं। ये दौड़ रहे हैं। देश उन्हें ‘हूट’ कर रहा है। ताकत का अहसास करवा रहा है। जीतेगा वही नायक होगा, यह भी तय है। सच है कि सीता के स्वयंवर में बहुतेरे पहुंचे। नायक तो एक ही मिला।
तब से लेकर आज तक हम लड़ा रहे हैं नायकों को। भिड़ रहे हैं। मैदान का नियम है जो अंतिम दम तक जीतता रहे वही विजेता। लगातार। विजेता का हक कोई दूसरा विजेता ही छीन सकता है। हमें क्या। देश को क्या। उस उक्ति को किसने नहीं सुना- कोऊ नृप होई हमें क्या हानि। हमें हर हाल में एक नायक चाहिए।
- हरीश बी. शर्मा
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shandaar lekhani……
outstanding….
बहुत खूब हरीश जी, आपकी लेखनी के आगे निःशब्द हूं…..!! आभार!!
kamal h sir,
andar tak hila diya.
लोक तंत्र के असली नायक तो हरीश जी मतदाता हैं चुनावों से ‘हूट’ कर जनता कोइ नायक नहीं बनाती ! आपने उपर जिनका उल्लेख किया है वो भी किसी के हूट करने से नही बने नायक.
शुभ रात्री
डॉ. राहुल हर्ष
प्रिय हरीश जी .हमे हर हाल में एक नायक चाहिए .बिलकुल दुरुस्त फ़रमाया आपने .और ऐसा केवल भारत में ही नही अपितु पुरे संसार में ही है .और ऐसा होना लाजमी भी है .वास्तव यह समस्या हमारे सुपेर्रिओटी काम्प्लेक्स और इनिन्फेर्रटी काम्प्लेक्स के साथ जुडी हुई है .जब तक हममे सुपेर्रिओटी रहेगी तब तक इनिन्फेर्रटी भी रहेगी .हमारी सुपेर्रिओटी चाहेगी कि लोग मेरा अनुसरण करे .मुझ में समझ और बुध्दी का स्तर लोगो के मुकाबले ज्यादा है .और हमारी इनिन्फेर्रटी हमे प्रेरित करती है हम किसी और का अनुसरण करे .और यह भी हकीकत है दोनों ही कोम्प्लेक्सेस एक साथ ही होते है. इससे बाहर आने का एक मात्र रास्ता है वह है आध्यात्मिक -जिसमे लोग कहेंगे -एको ब्रह्म द्वितयो नास्ति .
My Dear,
Again you wrote the thing which flames in every heart,I appriciate this.First you should define the LEADER(Nayak) so every one can know the real defination of him.Laymen only commit them who are fighting elections and selfmaid(suo called) Nayaks.Please spray this originality by print media and social programmes.Harish ji,you are really doing better efforts,by this way some internet savy will update themselves including me.I wish your idas and thoughts will generate some vibrations in this worst system and dirty politics.I again congratulate you for your new write up,which is thundering.All the best.
Uncle ji aap bahut achha likhte ho aur kabhi kabhi to main sochta hu ki ye baat aapke mind me aayi kaise kya mind hai apka wah….wah…….
priy harish bhai
aapane nayak chahiye ko bahut hi prbhavi tarike se vyakt kiya ha–badhai — mohan thanvi